बरस बरस करुणामय मेघ
काले पट सै ढक ले नभ कौ,
क्रोध ज्वाल को संचित कर
फिर
फट पड़ तीक्ष्णअग्नि-रेखा सी
फिर कररूणा से भर, अग-जग को
करुणा –प्लावित कर काल-मेघ,
तू बरस,बरस गरिमामयमेघ
फट पड़ जीवन की सॉंस जुड़ा
निःश्वास धरा की छू तो ले
मन की खुशबू का
सोंधापन
हर लेगा तेरी
पूर्ण थकन,
तेरी करुणाकी धार
अजस्त्र
करुणामय तेरा रूप
अमंद
तू बरस बरस जीवन
तरंग.
बरस बरस करुणामय
घन.
काला है तेरा रूप मगर
अंतस का स्वर्णिम संचित धन,
तू लाख छिपा वह ज्योति
प्रवर
देखा है तेरा स्वर्ण महल
विष्णु का वह पदचाप सदय
तेरी करुणा का पालित स्वर
जग के इस सूखे उपवन पर
तू बरस बरस करुणामय घन.।
आशा सहाय.....
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