शुक्रवार, 2 अगस्त 2024

 

विस्मृति के सघन मेघ से

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विस्मृति के सघन मेघ से

झाँकती जब किरण श्वेत

रंगों मे ढल जाने कितने

रच जाती नव जीवन स्वरूप

मुक्त करतीं हृदय भार

गढ़ती नव नव जीवन सुवेश

नव पथ के फिर नव प्रवाह से

भर  जीवन के नव  सुभग  ताल

अंतहीन देतीं उर्जा

शान्त धवल मुक्ता  सम कान्ति

प्रखर  दीप्ति हीरक की

उमगतीं बन स्वर्ण तरंग

बिहंसता जीवन  का  तार तार

अनुप्राणित होता   मनःप्राण।

 

  सहाय

 

 

शब्द मेरे

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शब्द मेरे

बाँध मुझको

हैं वे स्वच्छंंद

मेरे  ध्यान

वे  विचार

खेेलतेहैं बंधनों  से

तोड़ते है  तर्ककारा

औ विचरते

 भाव  के

,मथित उत्थित विरल पथ पर

भूलते विश्वास सीमा का

ढूढते उत्तर कहीं   निस्सीमता में

प्रश्न जो उठते धरा से

रक्तरंजित  अश्रुओं  के।

सोच कीउच्छिष्टता औ

लोभ की गँदली नदी  में

डूबते  सम्मान  के

अहं औ अभिमान  के ।.

शब्द मेरे

बाँध  मुझको

बंध तुम्हारे बंधनों में

ढूंढ लूं मैं प्रश्न  के उत्तर सही

आचार के

हत मनुजता के सभी

भर्त्स्य अ्नाचार के।

 

आशा सहाय-23-2--2021

 

 

 

 

 

 

जाते हुए सावन से

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उपर उठने को तत्पर

हरी दूब, रण रंगिणी

बाँहें फैलाए पेड़पौधे

झूमते , बढते जाते

ताल तलैये

तोड़ते हर बंधन बाँध

नदियाँ

उफनती डुबोतींकूल किनारे।

 

बेलपत्र शंकर शिव प्रलयंकर

भाँग धतूरा

भागते  सुबह के पैर

भगदड़ मंदिर में

चंदन  काँवर

मेघों की झड़ी अनगढ़।

 

कपड़े अधसूखे

अलगनी और अलगनी

टँगी आँखें

आकाश में

 

बाढ़ ,नौका

तैरते लोग

गिरते पछड़ते

दबते मरते

 

घिसकते टूटते चट्टान,

फटते बादल दहाड़

बहते दहते

पर्वत, घर मानव पशु

  झोपड़ महल

चीखते चिल्लाते नर

झड़ी की लड़ी

अड़ी औअड़ी ।

 

तंग प्रशासन

सावन रे सावन।

 

आशा सहाय।18-8-2021--।

 

शनिवार, 27 जुलाई 2024

 

संझा खोयी स्मृतियों में

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सम्मोह प्रात का था अनुपम

लालित्य भरा

भोला सा मुख

था ढूंढ़ रहा रोटी का सुख

ममता का आँचल था पकड़े

दिन बढ़ा, पका और भूल गया वह भोलापन

अब स्वर्ण प्रहर दिन काथा यह

विस्तीर्ण जगत के प्राँगण में

कर्मठ वन था पसर रहा

अग्नि सा तपा ,तपा दिन भर।

 

वीथियाँ फैली उलझनों की थी

शाखाएँ बढ रहींथीं बेसब्र सी

लिपटी थीं अनगिन वे उनमे

वे महाजाल

कुछ बुने हुए कुछ अधबुने

दिन फँसा रहा था द्वन्द्वों में

आत्मा की फाँस भी बिसर गयी

सन्निकट कहीं थी साँझ वहीं

उष्मा तन की सहलाती सी।

सुलझाती सी जालों को कुछ

 

खो गयी साँझ स्मृतियों में कहीं।

 डूबी जो प्रहर ताप में वह

अस्तित्व खो गया था अपना

निज जीवन सत्य भुला बैठी।

डूबते खिसकते ताप मे

था हुआ बोध

 

साँझ है वह

और उन्मुख है निशा की ओर

आलिंगन करना उसे

अगले प्रहर के मौन को

बाँटना उसे भी दिवस सत्य

प्रबल मोह , संघर्ष सत्य वह

 

साँझ है वह

है वही विश्राम सत्य

थकित दिवस का प्राण सत्य

जा डूबना है निशा के अलस क्रोड़ मे।

किन्तु विस्मृत हो कैसे

दिवस का कठिन संघर्ष सत्य!!

एक स्वर्णिम स्मृति तब भी

घेरती उसका, तन मन है नित्य

खो रही है साँझ स्मृतियों के सुनहले जाल में।

 

आशा सहाय

 

जीवन रसस्विनी पीड़ा की

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जीवन रसस्विनी पीड़ा की

उर्मियाँ हर्ष की रह रह कर

बहलाती मन को यदा कदा

मेटा करतीं बस इकरसता।

अंतस की नव लघु इच्छाएँ

बन मन तरंग उमगा करतीं

पीड़ा की शाश्वत उदधि मे

उठतीं जगतीं वे मिटजातीं

शतधा बिखरतीं वे तट पर

हो खंड खंड टूटतीं कभी।

 

है मनुज मात्र द्रष्टा उनका

जुड़ता मन पीड़ा सेक्षण क्षण

 अनुभूतियाँ जमतीं तह पर तह

अन्तरतम होता विकल विकल

हृद कंपित संवेदन विगलित

और अश्रुभार होता दूभर

तूलिका होती खचित पट पर

लेखनी अंकित द्रुत कागज पर

 

तू समझ पीर प्रकृति की ऐ मन!

जन जन की  जग -पीड़ा में रम

यह घोर  मेघ है मन  नभ का

अंतर में इसे उमड़ने दे

फिर सहज सहज बरसने दे।

 

आशा सहाय

20--1--2021

 

 

जीवन रसस्विनी पीड़ा की

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जीवन रसस्विनी पीड़ा की

उर्मियाँ हर्ष की रह रह कर

बहलाती मन को यदा कदा

मेटा करतीं बस इकरसता।

अंतस की नव लघु इच्छाएँ

बन मन तरंग उमगा करतीं

पीड़ा की शाश्वत उदधि मे

उठतीं जगतीं वे मिटजातीं

शतधा बिखरतीं वे तट पर

हो खंड खंड टूटतीं कभी।

 

है मनुज मात्र द्रष्टा उनका

जुड़ता मन पीड़ा सेक्षण क्षण

 अनुभूतियाँ जमतीं तह पर तह

अन्तरतम होता विकल विकल

हृद कंपित संवेदन विगलित

और अश्रुभार होता दूभर

तूलिका होती खचित पट पर

लेखनी अंकित द्रुत कागज पर

 

तू समझ पीर प्रकृति की ऐ मन!

जन जन की  जग -पीड़ा में रम

यह घोर  मेघ है मन  नभ का

अंतर में इसे उमड़ने दे

फिर सहज सहज बरसने दे।

 

आशा सहाय

20--1--2021

 

 

है कोई अन्य सा एक अन्तरिक्ष

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है कोई अन्य सा एक अन्तरिक्ष

फूटकर बिखरे हों जिसमे ग्रह अनन्त !

काल कोई अन्य सा हो चक्ररथ

नृत्य करता हो कोई ब्रह्माण्ड अन्य!

या कि कोई अनुकृति ही साँस लेती हो कहीं!

भ्रमित मन है विमूढ़

कौन जाने वहीं कहीं

हूँ कदाचित जी रही चुपचाप मैं

हूँ जहाँ निर्बन्ध मैं मु्क्त आयु भार

कौंधता मानस में है एक क्षीण सा एहसास

पार इस जीवन के भी है किसी जीवन का सुधड़ विस्तार!

तार जिसके हैं बंधे  इस जीव से ही

वही क्रीड़ा कर रही हूँ , नाट्य का जुड़ गया है शेष भाग।

है कोई अनुकृति मेरी

भीगती हो बादलों मे सद्यस्नात

और चिहुँकती देख विद्युत छटा

काटती या तार वर्षा के वहाँ

अदृश्य चरखे पर किसी

कर रही हो नृत्य शायद मौसम के सुहाने ताल पर!!

साँस नहीं लेने देती है विकलता

किस तरह पहुँचू वहाँ मैं काल के उस पार

हे महाकाल!

अंतरिक्ष का गर कोई अन्य सा अस्तित्व भी -

है तुम्हारे रूप का विस्तार

निराकार वह दृष्टि तेरी देखती मुझको वहाँ

मैं अनागत

या विगत मैं

या कि हूँ आगत वहाँ भी

एक दृष्टि दो मुझे भी  तृप्त होऊँ

शान्त हो मेरी विकलता

कल्पना के पार झाँकूँ

मेट लूँ वह नयन तृषा

विगत चिन्तन भार

किन्तु शेष है प्रश्न तब भी

क्या नहीं होगी खतम इस पार  ही आयु मेरी

शेष की कोई कथा क्या लिखनी पड़ेगी

जा कहीं अंतरिक्ष के पार

है कोई जो एक सा

ले काल का अन्य कोई साथ.!!

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आशा सहाय  21 -7-2020