शुक्रवार, 2 अगस्त 2024

 

जाते हुए सावन से

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उपर उठने को तत्पर

हरी दूब, रण रंगिणी

बाँहें फैलाए पेड़पौधे

झूमते , बढते जाते

ताल तलैये

तोड़ते हर बंधन बाँध

नदियाँ

उफनती डुबोतींकूल किनारे।

 

बेलपत्र शंकर शिव प्रलयंकर

भाँग धतूरा

भागते  सुबह के पैर

भगदड़ मंदिर में

चंदन  काँवर

मेघों की झड़ी अनगढ़।

 

कपड़े अधसूखे

अलगनी और अलगनी

टँगी आँखें

आकाश में

 

बाढ़ ,नौका

तैरते लोग

गिरते पछड़ते

दबते मरते

 

घिसकते टूटते चट्टान,

फटते बादल दहाड़

बहते दहते

पर्वत, घर मानव पशु

  झोपड़ महल

चीखते चिल्लाते नर

झड़ी की लड़ी

अड़ी औअड़ी ।

 

तंग प्रशासन

सावन रे सावन।

 

आशा सहाय।18-8-2021--।

 

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