शनिवार, 27 जुलाई 2024

 

संझा खोयी स्मृतियों में

-----------------

सम्मोह प्रात का था अनुपम

लालित्य भरा

भोला सा मुख

था ढूंढ़ रहा रोटी का सुख

ममता का आँचल था पकड़े

दिन बढ़ा, पका और भूल गया वह भोलापन

अब स्वर्ण प्रहर दिन काथा यह

विस्तीर्ण जगत के प्राँगण में

कर्मठ वन था पसर रहा

अग्नि सा तपा ,तपा दिन भर।

 

वीथियाँ फैली उलझनों की थी

शाखाएँ बढ रहींथीं बेसब्र सी

लिपटी थीं अनगिन वे उनमे

वे महाजाल

कुछ बुने हुए कुछ अधबुने

दिन फँसा रहा था द्वन्द्वों में

आत्मा की फाँस भी बिसर गयी

सन्निकट कहीं थी साँझ वहीं

उष्मा तन की सहलाती सी।

सुलझाती सी जालों को कुछ

 

खो गयी साँझ स्मृतियों में कहीं।

 डूबी जो प्रहर ताप में वह

अस्तित्व खो गया था अपना

निज जीवन सत्य भुला बैठी।

डूबते खिसकते ताप मे

था हुआ बोध

 

साँझ है वह

और उन्मुख है निशा की ओर

आलिंगन करना उसे

अगले प्रहर के मौन को

बाँटना उसे भी दिवस सत्य

प्रबल मोह , संघर्ष सत्य वह

 

साँझ है वह

है वही विश्राम सत्य

थकित दिवस का प्राण सत्य

जा डूबना है निशा के अलस क्रोड़ मे।

किन्तु विस्मृत हो कैसे

दिवस का कठिन संघर्ष सत्य!!

एक स्वर्णिम स्मृति तब भी

घेरती उसका, तन मन है नित्य

खो रही है साँझ स्मृतियों के सुनहले जाल में।

 

आशा सहाय

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें