शनिवार, 27 जुलाई 2024

 

भूल गई थी मैं वसंत को

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यह तितली

है पास मेरे आ रही

जाने क्या क्या कह रही

बैठ मेरी नासिका पर

"क्या अनुभव नहीं किया मधु स्पंद उस सुगन्ध का

ले जिसे मैं साथ अपने  सूक्ष्म पैरों ओ परों में

बहक हवा के मदिर अश्व पर सवार

 आरही तुमतक  बारम्बार!!"

शायद मैं अबतक भूली थी

वसन्त मेरे पास आ गया

"तुम ऐसी तो नहीं कभी थी

मोहकता बसन्त की भूली तो नहीं कभी थी

आज क्यों उदास

खो गया क्यों सम्मोहन

खो गयी विस्मृति के जाल में!!

लो जगो ,प्रकृति की महक लो

स्पर्श करो नव जीवन का

छू पाये तुम्हारा अन्तरतम

कुछ ऐसा देखो विहँस जियो

उठो चलो ,जरा सुध लो मेरी।"

हाँ अनुभव किया तुरत मैने

आम्र मंजरी की सुगंध मदिर

देखा पलाश के पुष्प गुच्छ

थे पथ में बिछे पीत रक्तिम

मधुवाहिनी बयार झिर झिर

बहकी बहकी छू रही मुझे

मन पुलक उठा  स्मृति जगी

हाँ !आ गया वसन्त सच ही

अरी रंगिणी वसन्त कीतू!

भूली थी मैं वसन्त को पर

भूला नहीं वसन्त मुझको।

 

आशा सहाय   10-2--2022

 

 

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