शनिवार, 27 जुलाई 2024

 

है कोई अन्य सा एक अन्तरिक्ष

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है कोई अन्य सा एक अन्तरिक्ष

फूटकर बिखरे हों जिसमे ग्रह अनन्त !

काल कोई अन्य सा हो चक्ररथ

नृत्य करता हो कोई ब्रह्माण्ड अन्य!

या कि कोई अनुकृति ही साँस लेती हो कहीं!

भ्रमित मन है विमूढ़

कौन जाने वहीं कहीं

हूँ कदाचित जी रही चुपचाप मैं

हूँ जहाँ निर्बन्ध मैं मु्क्त आयु भार

कौंधता मानस में है एक क्षीण सा एहसास

पार इस जीवन के भी है किसी जीवन का सुधड़ विस्तार!

तार जिसके हैं बंधे  इस जीव से ही

वही क्रीड़ा कर रही हूँ , नाट्य का जुड़ गया है शेष भाग।

है कोई अनुकृति मेरी

भीगती हो बादलों मे सद्यस्नात

और चिहुँकती देख विद्युत छटा

काटती या तार वर्षा के वहाँ

अदृश्य चरखे पर किसी

कर रही हो नृत्य शायद मौसम के सुहाने ताल पर!!

साँस नहीं लेने देती है विकलता

किस तरह पहुँचू वहाँ मैं काल के उस पार

हे महाकाल!

अंतरिक्ष का गर कोई अन्य सा अस्तित्व भी -

है तुम्हारे रूप का विस्तार

निराकार वह दृष्टि तेरी देखती मुझको वहाँ

मैं अनागत

या विगत मैं

या कि हूँ आगत वहाँ भी

एक दृष्टि दो मुझे भी  तृप्त होऊँ

शान्त हो मेरी विकलता

कल्पना के पार झाँकूँ

मेट लूँ वह नयन तृषा

विगत चिन्तन भार

किन्तु शेष है प्रश्न तब भी

क्या नहीं होगी खतम इस पार  ही आयु मेरी

शेष की कोई कथा क्या लिखनी पड़ेगी

जा कहीं अंतरिक्ष के पार

है कोई जो एक सा

ले काल का अन्य कोई साथ.!!

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आशा सहाय  21 -7-2020

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