शनिवार, 27 जुलाई 2024

 

जीवन रसस्विनी पीड़ा की

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जीवन रसस्विनी पीड़ा की

उर्मियाँ हर्ष की रह रह कर

बहलाती मन को यदा कदा

मेटा करतीं बस इकरसता।

अंतस की नव लघु इच्छाएँ

बन मन तरंग उमगा करतीं

पीड़ा की शाश्वत उदधि मे

उठतीं जगतीं वे मिटजातीं

शतधा बिखरतीं वे तट पर

हो खंड खंड टूटतीं कभी।

 

है मनुज मात्र द्रष्टा उनका

जुड़ता मन पीड़ा सेक्षण क्षण

 अनुभूतियाँ जमतीं तह पर तह

अन्तरतम होता विकल विकल

हृद कंपित संवेदन विगलित

और अश्रुभार होता दूभर

तूलिका होती खचित पट पर

लेखनी अंकित द्रुत कागज पर

 

तू समझ पीर प्रकृति की ऐ मन!

जन जन की  जग -पीड़ा में रम

यह घोर  मेघ है मन  नभ का

अंतर में इसे उमड़ने दे

फिर सहज सहज बरसने दे।

 

आशा सहाय

20--1--2021

 

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