शुक्रवार, 2 अगस्त 2024

 

शब्द मेरे

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शब्द मेरे

बाँध मुझको

हैं वे स्वच्छंंद

मेरे  ध्यान

वे  विचार

खेेलतेहैं बंधनों  से

तोड़ते है  तर्ककारा

औ विचरते

 भाव  के

,मथित उत्थित विरल पथ पर

भूलते विश्वास सीमा का

ढूढते उत्तर कहीं   निस्सीमता में

प्रश्न जो उठते धरा से

रक्तरंजित  अश्रुओं  के।

सोच कीउच्छिष्टता औ

लोभ की गँदली नदी  में

डूबते  सम्मान  के

अहं औ अभिमान  के ।.

शब्द मेरे

बाँध  मुझको

बंध तुम्हारे बंधनों में

ढूंढ लूं मैं प्रश्न  के उत्तर सही

आचार के

हत मनुजता के सभी

भर्त्स्य अ्नाचार के।

 

आशा सहाय-23-2--2021

 

 

 

 

 

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