शब्द मेरे
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शब्द मेरे
बाँध मुझको
हैं वे
स्वच्छंंद
मेरे ध्यान
वे विचार
खेेलतेहैं
बंधनों से
तोड़ते
है तर्ककारा
औ विचरते
भाव के
,मथित उत्थित
विरल पथ पर
भूलते
विश्वास सीमा का
ढूढते उत्तर
कहीं निस्सीमता में
प्रश्न जो उठते
धरा से
रक्तरंजित अश्रुओं
के।
सोच
कीउच्छिष्टता औ
लोभ की गँदली
नदी में
डूबते सम्मान
के
अहं औ
अभिमान के ।.
शब्द मेरे
बाँध मुझको
बंध तुम्हारे
बंधनों में
ढूंढ लूं मैं
प्रश्न के उत्तर सही
आचार के
हत मनुजता के
सभी
भर्त्स्य
अ्नाचार के।
आशा सहाय-23-2--2021
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