रविवार, 31 अगस्त 2014

श्रद्धाहीना



नारी तुम केवल श्रद्धा हो
मैने प्रसाद स्वीकार किया।
पर हाय कहाँ..!
जीवन के कंटक पथ पर ,
श्रद्धा के फूल जब बिंधते हों
विश्वासों की चूलें जब सरल घातों से हिलती हों,
समतलता चुभती आँखों                                        में में
जहरीली वायु बहती हो,
साँसों को इनकीआददत हो..।

जीवनचर्या ही बनती हो—
विषमय सोचों से, करतब से-,
पिघले सीसों की राहों पर,
जब लौह कील से पदत्राण
चोटों पर चोट लगाते हों.
बनता हो इनसे नव समाज
नव परिभाषाएँ गढ़ती हों।

अस्तत्ववाद के मुखर स्र्वर,
विश्वास-अमिय के धारों को,
व्यंगयाक्ष,कटाक्ष-कटारों से
बस काट-काट कर तार-तार।
करता जाता हो बार बार।



तब मुक्ति-प्रदायिनी नारी को,
उस शान्त रसस्विनी नारी को,
पियूषवर्षिणी नारी को—
श्रद्धा कोमलता के पथ पर कोई कैसे ले जाता है!

जीवन की सुन्दरता का पथ
कोई कैसै रच सकता है
कोई कैसे कह सकता है
नारी तुम केवल श्रद्धा हो..?!1----आशा सहाय—22-5-2006--।

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