रविवार, 31 अगस्त 2014

युद्ध—



    यह कैसा युद्ध—
आगत किन्तु अनचाहा सा—
ज्यों महामाँग सर्वत्र उठे ,
युद्धं  देहि युद्धं देहि?-?-?—
इतिहास के बिखरे पन्नों पर
युद्धं देहि युद्धं देहि
होगा भविष्य युद्धं देहि-।
किन्तु बोलो,कल्याण महा  ??
निज जाति धर्म का कष्ट प्रसार-??
विश्वास कठिन, दर्शन सुचिंत्य-
औचित्य प्रश्न युद्धं देहि-।
खेमे खेमे में बँटा जगत
पर लक्ष्य सभी का एक यहाँ—
सब शक्तिहीन हों,
बस अहं रहे अब पूर्ण प्रबल
शक्ति-संतुलन का खेल यही
नयनों के सम्मुख दीख रहा--...
अणु-परमाणु का विकट-राग
है डरा हुआ निरुपाय मनुज-।


है युद्ध नहीं कोई विकल्प
चिर शाँति ?
नही यह भी विकल्प
दुर्बल जीवन का नाश सही
दुर्बल जाति का नाश सही
पर क्या इनसे हो रिक्त मही--?
क्या इनका कुछ अ धिकार नही--?
पर शान्ति महा जड़ मूढ़ अचेत
कर्तव्य-हीन ,ऊर्जा विनष्ट
किं किं न करोति पाप प्रबल
भयमुक्त प्रजा हो दिग्विमूढ़—
नर शापित सा चिर शाँति क्रोड़,
नर शापित सा चिर युद्ध क्रोड़
फिर यही सही,
जागे जब-जब अधिकार-बोध
जागे जब-जब अभिमान बोध
युद्धं देहि,युद्धं देहि—
अनचाहा पर अनिवार्य यद्ध-

युद्धं देहि युद्धं देहि—।


आशासहाय---1-7-99--।

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