खोलो चिन्तन के महाद्वार..
इस धर्म कुहर के अन्तस में,
उज्ज्वल-उज्ज्वल श्वेताभ भाव
उज्ज्वल-उज्ज्वल श्वेताभ भाव
शाश्वत करुणा का महाभाव
इस चन्द्र-ज्योत्स्ना में
उलझा
जीवन का सारा तार,सार..।
जीवन मृत्यु के विषम युद्ध
का अन्त यहीं
मानवता के उस सहज बोध का
उत्स यहीं,
मानव विलास के चरम रोग का
भस्म यहीं
इस दुग्ध धवल धारा में ही
है
चिन्तन का सारा वीचि- विलास
उठते गिरते, मिटते हैं सब
हो जाते बस सब क्षार क्षार
खोलो चिन्तन के
महाद्वार....।
आशा सहाय......2-5-2011---।
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