रविवार, 31 अगस्त 2014

काव्य



फूटा क्यों अन्तस से प्रवाह...
यह किन भावों का महाज्वार...
शब्दों ध्वनियों का लय-प्रवाह..?
या व्रण का अन्तस के महा भार...
इतना ही सा था मनःविकार..?
जीवन के महासमर के इस
वैचारिक मंथन का तत्व-सार…?
यह भी इतना क्या प्रबल आह।
यह प्रेम विरह का कथा –सार..

या प्राप्ति त्याग का मिलन –काव्य...
यह हृदय क्षोभ का चरम भाव..।
मन-कोनों को यह मथित,व्यथित,
उत्थित कर मन के चरम भाव
फूटा ज्यों सात्विक मनः विकार...।
यह मन की यात्रा है महार्ध,
मन –महाज्वार का लय-प्रवाह...।.।


आशा सहाय..3-5-2011...।

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