कविता क्या केवल तल्खी है
क्रन्दन है रूठे बिछड़ों का?
वचनों,मन से कर्मों से जो,
जीवन-सुन्दरता को बुनते...
उनको भी तो अभिव्यक्ति दो ।
कविता क्या व्यथा कथा केवल
जग से हारे की जथा केवल
कविता क्या संवेदन- छलना है..?
जो जीत गये संघर्षों मे
सुख को उनके अभिव्यक्ति दो।
गर हास्य, व्यंग्य, करुणा
ही बस
है मृदुल काव्य का विषय
बना...
आह्लादन सुख का कहाँ धरा...?
आह्लादन सुख का कहाँ धरा...?
आधी अनुभूति जीवन की
कलमों से तुम वंचित न करो
सुख को उनके अभिव्यक्ति दो..।
जीवन में सु है शान्ति भी
है
संघर्षों की गर कथा कहो
उस शान्ति को भी अभिव्यक्ति दो..
उस शान्ति को भी अभिव्यक्ति दो..
कारुण्य,दुःखों के बुद्बुद
में
वीचि-विलास केचित्त प्रसार
को
नयनों की ओट न होने दो
चिन्मसता और जीवंत शान्ति
को
रसमयता में घुल जाने दो
उनको भी तो अभिव्यक्ति दो।...
आशा सहाय...5-12-2002--। ,
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें