भय से कु विचार उपजता है
भय से संदेह पनपता है
भय ही प्रतिकार की जननी है
भय से संस्कार जकड़ते हैं
भय की अग्नि में जलकर ही
संशय औ,फिर संकल्प जनित
प्रगति के सौ-सौ द्वार खुले
कुछ चरम उद्विग्नता के क्षण
में
सौ-सौ स्वरूप धर भय आता,
भय की सीढ़ियाँ चढ़-चढ़कर
उलझन के तार सुलझते हैं।
भय से संतप्त चराचर यह
पल भर न सहज हो पाता है
वायु धरती अग्नि से डर
दो श्वास सहज नहीं ले पाता
भयसंचालित यह विश्व मगर फिर
भी नियमों से जीता है—
खिलते हैं फूल,नभचर पलते
तारे भी नियमों पर चलते
फिर मन के निभृत कोने में
कैसे बैठा यह शाश्वत भय ..?
यह भय ही है जिसने बाँधा
जन को जन से सम्बन्धों में
,
फिर निभा प्रीति,सोहृद बना
अपनापा का सिद्धांत गढ़ा।
भय से बचने के लिये हाय,
कितनों को भय से पाट दिया।
भय ने नदियों को बाँध दिया
बरबस उनका मुँह मोड़ दिया
जंगल से शहरों को भागे,
नव सृष्टि बनायी भय ने ही
इन नभ छूते भवनों से फिर
झाँकते धरा वातायन से
इन लोगों से पूछो तो जरा..
कयों सोते नहीं धरा पर वे?
वनचर के साथ नहीं रहते..?
छोटे कुंजों गुंजों से
क्यों..
उन घने विशाल वृक्षों परचढ़
निर्भयता नहीं अनुभव करते..?
यह भय हीहै...
कहीं भूख प्यास का भय
कहीं रोग-शोक का भय
जीवन के सपनों के कहीं छिन
जानै का भय...।
आशा सहाय—10-7-13--।
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