लगता है,नभ दो पाट हुआ।
घट फूट गया
बिखरे टुकड़े
बह चला अमिय जलधार
हुआ गर्जन तर्जन
देवों के कुंचित केशराशि
खुल गये चमक से,
वज्रेन्द्र हाथ से छूट गया
असुरों का फिर से घात हुआ।
लगता है,नभ दो पाट हुआ।
धरती स़ॅंवरी
अगवानी में।
धानी चुनरी की ओट लिये
कुछ मधुर याद।
स्मृतियों के सीकर से फिर
भींग गया सम्पूर्ण गात,
मिट्टी महकी सोंधी सोंधी
कोने कोने से पुरवैया,
ज्यों चली हुलास ।
नभ के बल-विक्रम से हुलसी
फिर सजा थाल अगवानी का
नीले-पीले फूलों से भर
अघरों पर मधु स्मित छिटका,
कोना-कोना ज्यों हुआ उजास,
फिर दिशा-दिशा मघुमास हुआ।
लगता है नभ दो पाट हुआ ।
आशा सहाय-----12-6-99 ।
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