मैंने सब देखा है—
देखा है मुग्ध सुबह की
सुन्दर स्वर्णिम पाँखों को
देखा है ,
तपती दुपहरिया की
जलती किरणों के नर्तन को,
और शान्त गुलाबी संध्याके
शामी सूरज के रौनक को-।
मैंने सब देखा है—
देखा है वसन्त की उस
खिलती-खिलती वेला को
मह-मह करते फूलों को।
देखा है,
पतझड़ के झाँय –झाँय सूनेपन
को-,
इस सी सी करते शिशिर को.,
इस सी सी करते शिशिर को.,
बन्द कमरे में घुटती साँसों
को—
मैंने सब देखा है।
आपस के द्वन्द्वों को।
कुढ़ते जलते मानस के
उन सहमे सहमे कोनों को,
वर्तमान के सुख दुख को
देखा है मैंने,भविष्य के
अंधकारमय डर को भी..
मैंने सब देखा है।
आगत के सच,अनागत की आशाओं
को.
भय को भी निराशाओं को भी—
मैंने सब देखा है।
गुंठन और अवगुंठन को,
अपने ही स्व से बुनते
,फँसते
बड़े-बड़े मकड़जालों को-।
मैंने सब देखा है ।
मैंने सब झेला भी है ..,
पर अपने ही मकड़जालों से
कोई कब हो सका मुक्त--!!
मैने सब समझा है..।
पर शायद कुछ नहीं समझा..
कुछ नहीं देखा कुछ नहीं
समझा
.--------आशा सहाय ---30-4-2011---।.
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