हे सौम्य-श्रेष्ठ ।
हे आप महान।
सबके शुभचिन्तक, मृदुल
उदार,
सबके प्रति करुणा का
प्रसार।
उज्ज्वल मन था स्वयं
आलोकित,
चहुं और छोड़ते भाव-प्रकाश।
थे सदा विनम्र, हॅंसमुख भी थे ।
लेकर जग के प्रति मित्रभाव
निर्लोभ ओर निष्काम सदा
कर्तव्य मार्ग पर अडिग रहे
व्यक्ति-व्यक्ति था चमत्कृत
आपकी प्रतिभा का कायल भी
सारा परिवेश जगमग करता
अनुपम था ज्ञान अनुभव अपार।
अत्यंत मृदुल ,अत्यंत कठोर।
अत्यंत सजग भी रहते थे।
परिवार समाज और कर्मक्षेत्र
समभाव सभी पर रखते थे।
है साधुपुरुष,
कर्तव्यप्राण
यह झारप्रदेश सन् तिरसठ से
था कर्मक्षेत्र आपका महान
यह कर्मक्षेत्र था
धर्मक्षेत्र जाने कब अपना सा भी हुआ.
यह गृहक्षेत्र बन गया पुनः
इसमे ही मन रमवा सा गया
थी सघन मित्र मंडली कभी
धीरे-धीरे छिनते ही गये
थे आप उदासपर नही छिनी
जीवन-उष्मा .
नूतन लक्ष्यों को खोज-खोज
जीवन-यात्रा पर बढ़े कदम
मन की ऊर्जा अक्षरित रही तन
की ऊर्जा पर क्षीण हुई
हे आप महान।
सबका कल्याण कर सकें, सधे
सबका हित,
थे सदा आप प्रयत्नशील।
जाने कितने-कितने प्रण थे,
पूरा करने को मन अधीर,
पर रुग्ण शरीर ने अवश किया
।
अक्षमता से लड़ते ही रहे
होने न दिया हावी स्वयं पर
अंतिम क्षण, अंतिम सांसों
तक
पराजित ही किया अक्षमता को
चिर शक्तिमान थे आप सबल
सबमे ऊर्जा भरते ही रहे
मन की शक्ति से सबको
प्रेरित
हे महाप्राण करते ही रहे ।
हे अविस्मरणीय महान----
हम भूल नहीं सकते हैं कभी
प्यारी तेरी मोहक मुस्कान।
जाने कितनो को उल्लसित किया
निज संगति बोल-विचारों से
हम नहीं कभी भूलेंगे
तुम्हें तुम रहो सदा हम सबमें व्याप्त ।
लो स्नेह, श्रद्धा, पूजा
हमसे
श्रद्धांजलि लो, स्वीकार
करो ।
आशी ही नहीं, ऋचा, शुचि, द्युति,
अभिनव-रंजना और प्रशांत
प्रिय किंशुक, तान्या और उन्मिषा,
प्रिय आरव, उत्सव और मनन..
सबही नतमस्तक हो करते शत शत
नहीं कोटि नमस्कार।
लें लें उनको स्वीकार करें,
दें आशिष वे बढ़ सकें सतत्
जीवनपथ पर सक्षमता से ओ, सबलता से।
शतकोटि प्रणाम-----------------आपका सम्पूर्ण परिवार----।.
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