रविवार, 31 अगस्त 2014

भय



भय से कु विचार उपजता है
भय से संदेह पनपता है
भय ही प्रतिकार की जननी है
भय से संस्कार जकड़ते हैं

भय की अग्नि में जलकर ही
संशय औ,फिर संकल्प जनित
प्रगति के सौ-सौ द्वार खुले
कुछ चरम उद्विग्नता के क्षण में
सौ-सौ स्वरूप धर भय आता,
भय की सीढ़ियाँ चढ़-चढ़कर
उलझन के तार सुलझते हैं।
भय से संतप्त चराचर यह
पल भर न सहज हो पाता है
वायु धरती अग्नि से डर
दो श्वास सहज नहीं ले पाता
भयसंचालित यह विश्व मगर फिर भी नियमों से जीता है—
खिलते हैं फूल,नभचर पलते
तारे भी नियमों पर चलते
फिर मन के निभृत कोने में कैसे बैठा यह शाश्वत भय ..?
यह भय ही है जिसने बाँधा
जन को जन से सम्बन्धों में ,
फिर निभा प्रीति,सोहृद बना
अपनापा का सिद्धांत गढ़ा।
भय से बचने के लिये हाय,
कितनों को भय से पाट दिया।
भय ने नदियों को बाँध दिया
बरबस उनका मुँह मोड़ दिया
जंगल से शहरों को भागे,
नव सृष्टि बनायी भय ने ही
इन नभ छूते भवनों से फिर
झाँकते धरा वातायन से
इन लोगों से पूछो तो जरा..
कयों सोते नहीं धरा पर वे?
वनचर के साथ नहीं रहते..?
छोटे कुंजों गुंजों से क्यों..
उन घने विशाल वृक्षों परचढ़ निर्भयता नहीं अनुभव करते..?

  
 यह भय हीहै...
कहीं भूख प्यास का भय
कहीं रोग-शोक का भय
जीवन के सपनों के कहीं छिन जानै का भय...।


आशा सहाय—10-7-13--।

युद्ध—



    यह कैसा युद्ध—
आगत किन्तु अनचाहा सा—
ज्यों महामाँग सर्वत्र उठे ,
युद्धं  देहि युद्धं देहि?-?-?—
इतिहास के बिखरे पन्नों पर
युद्धं देहि युद्धं देहि
होगा भविष्य युद्धं देहि-।
किन्तु बोलो,कल्याण महा  ??
निज जाति धर्म का कष्ट प्रसार-??
विश्वास कठिन, दर्शन सुचिंत्य-
औचित्य प्रश्न युद्धं देहि-।
खेमे खेमे में बँटा जगत
पर लक्ष्य सभी का एक यहाँ—
सब शक्तिहीन हों,
बस अहं रहे अब पूर्ण प्रबल
शक्ति-संतुलन का खेल यही
नयनों के सम्मुख दीख रहा--...
अणु-परमाणु का विकट-राग
है डरा हुआ निरुपाय मनुज-।


है युद्ध नहीं कोई विकल्प
चिर शाँति ?
नही यह भी विकल्प
दुर्बल जीवन का नाश सही
दुर्बल जाति का नाश सही
पर क्या इनसे हो रिक्त मही--?
क्या इनका कुछ अ धिकार नही--?
पर शान्ति महा जड़ मूढ़ अचेत
कर्तव्य-हीन ,ऊर्जा विनष्ट
किं किं न करोति पाप प्रबल
भयमुक्त प्रजा हो दिग्विमूढ़—
नर शापित सा चिर शाँति क्रोड़,
नर शापित सा चिर युद्ध क्रोड़
फिर यही सही,
जागे जब-जब अधिकार-बोध
जागे जब-जब अभिमान बोध
युद्धं देहि,युद्धं देहि—
अनचाहा पर अनिवार्य यद्ध-

युद्धं देहि युद्धं देहि—।


आशासहाय---1-7-99--।

नवागत वर्षा---



लगता है,नभ दो पाट हुआ।
घट फूट गया
बिखरे टुकड़े
बह चला अमिय जलधार

 हुआ गर्जन तर्जन
देवों के कुंचित केशराशि
खुल गये चमक से,
वज्रेन्द्र हाथ से छूट गया

असुरों का फिर से घात हुआ।
लगता है,नभ दो पाट हुआ।

धरती स़ॅंवरी
अगवानी में।
धानी चुनरी की ओट लिये
कुछ मधुर याद।
स्मृतियों के सीकर से फिर भींग गया सम्पूर्ण गात,
मिट्टी महकी सोंधी सोंधी
कोने कोने से पुरवैया,
ज्यों चली हुलास ।
नभ के  बल-विक्रम से हुलसी
फिर सजा थाल अगवानी का
नीले-पीले फूलों से भर
अघरों पर मधु स्मित छिटका,
कोना-कोना ज्यों हुआ उजास,
फिर दिशा-दिशा मघुमास हुआ।
लगता है नभ दो पाट हुआ ।


आशा सहाय-----12-6-99