विस्मृति के सघन मेघ से
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विस्मृति के सघन मेघ से
झाँकती जब किरण श्वेत
रंगों मे ढल जाने कितने
रच जाती नव जीवन स्वरूप
मुक्त करतीं हृदय भार
गढ़ती नव नव जीवन सुवेश
नव पथ के फिर नव प्रवाह से
भर
जीवन के नव सुभग ताल
अंतहीन देतीं उर्जा
शान्त धवल मुक्ता सम कान्ति
प्रखर दीप्ति हीरक की
उमगतीं बन स्वर्ण तरंग
बिहंसता जीवन का तार
तार
अनुप्राणित होता मनःप्राण।
आ
सहाय